मंजिल कविता

माझी ही कविता सर्वानी वाचा.
           *मंजिल*

*जो चिज जिसकी होती है !
उसको ही मिलनी होती है !
नदिया को तो सागर से ही मिलना है !
चाहे भटकले वो किधर भी ,
जाना तो उसे वहा ही है !
कोई क्या रोकेगा उसे ?
रोकांभी तो कभी ना रोक पायेगा कभी ,
मंजिल से ही मिल जायेगी वो कभी ना कभी*

      कवि .विजय नामदेव त्रिभुवन
        मो.नं. 8605895244
        #सत्तापरिवर्तनम्हणजेकाय?

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