अंगुलीमाल
मी ही कविता लिहिली अंगुलिमाल वरती सर्वानी वाचा आवडल्यास पुढे पाठवा...
अंगुलिमाल था वो बुध्दीमान,,
उसके गुरूने दि उसको सौगात.
चाहिए मुझे गुरूदक्षिणा में
१००० लोगो की उँगलिया..
इसलिए अहिंसक से बना वो हिंसक
जो पढना , लिखना चाहता था !!
उसको हाथो में लेना पडा हत्यार ,
गुरू दक्षिणा में अगर गुरू मांगता जान,,,
वो भी दे देता वो यार
लेकिन उसके गुरू ने मांगी दुसरो की जान,,
बेबस लाचार मासुम वो समज न पाया गुरू का जाल,,
गुरू को दक्षिणा देने के कारण,
फिरता रहा जंगलो में
मारता रहा वो लोगो को,,
लोगो से करने लगा नफरत
लोग भी करने लग उससेे नफरत
एक दिन यह बात गौतम बुध्द को समझी.
उनोन्ही तो ये फिर पहेली सुलझाई,,
गये वो सिधे उस वन में,,
जहॉ निवास था उस ईन्सानो को मारके, अँगुली काटकर गेले में जो पहेनता था||
लोगो की निंद सपने जिसने हराम कर दिये थे
वो कोई दुसरा नही वो वही अंगुलिमाल था
उस घने जंगल में बुध्द को देखा उसने,,
उसको बहुत आनंद हुआ.
१००० अंगुली का संकल्प आज पुरा जो आज होना था!!
बुध्दने भी उसे देखा
उसने भी बुध्द को देखा..
उसे लगा ऐ आदमी अब मुझसे डरेगा..रोयेगा..
अपनी जानकी भिख मुझसे मांगेगा..
अब ना चलेगी उसकी चाल..
रूक जायेगी अब उसकी साँस..
पर हुआ ना एेसा ,,
अंगुलीमाल हुआ अंचबीेत,, देखकर करूणासागर बुद्ध को,, देखा उनका चेहरा चेहरे पर ना था भय न कम्पा
अंगुलीमाल ने एेसा पहिली बार
महसुस किया,,
सोचा मन में देखकर मुझको भाग जाते थे लोग !!
डर कर ही मर जाते थे!!
पर ये कोन ईन्सान है आया,
जिसने मुझे ही डराया!!
मारने के लिए बुध्द के पिछे भाग रहा था,,
पर बुध्द चलते रहे फिर भी बुध्द को न पकड पाया !!
भागते भागते पुरा थक गया,
बुध्द को वह रुक ने को कह रहा!!
बुध्द बोले में रुकाही हुआ हुँ !!
तु ही भाग रहा है, इस मोहजाल का खेल तुही खेल रहा है!!
बुध्द ने उसको एक काम बताया
पेड के पत्ते काटने को कहा,,
ईतना आसान काम उसे झटसे किया,,
बुध्द ने फिर कहा ये पत्ते जोड के आओ.!!
वो फिर पत्ते लेकर दौडकर पेड के पास गया !!
पत्ते को फिर से पत्ते पेड पर लगवाने की कोशिश करता रहा ,,
कोशिश उसकी अधुरी रही !!
बुध्द की बात उसके ध्यान में आई,,
गया वो बुध्द के पास
पैर पकडके रोने लगा,
बुध्द ने सोचा चलो ,""अब ये भी ईन्सान बन गया ""
बुध्द ने उसके अंदर के बुध्द को जगाया !!
नये धम्म का मार्ग दिख लाया !!
संघ में उसको दिक्षा दी !!
अंगुलीमाल फिर जिंदगी भर कहता रहा !!
बुध्दं सरणं गच्छामी !!!
सघं सरणं गच्छामी !!!
धम्मं सरणं गच्छामी !!!
विजय नामदेव त्रिभुवन
मुकुंदवाडी औरंगाबाद
जाणिव जागृती अभियान
जागे व्हा जागे करा
मो.नं ८६०५८९५२४४
Comments
Post a Comment